ज्ञानेश्वरी अध्याय १८ भाग2

ग्रंथ - पोथी  > भावार्थदीपिका ज्ञानेश्वरी Posted at 2018-12-06 14:46:17
||ज्ञानेश्वरी भावार्थदीपिका अध्याय १८ || part 2 यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः | क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ||२४|| तरी घरीं मातापितरां| धड बोली नाहीं संसारा| येर विश्व भरी आदरा| मूर्खु जैसा ||५९५|| का तुळशीचिया झाडा| दुरूनि न घापें सिंतोडा| द्राक्षीचिया तरी बुडा| दूधचि लाविजे ||५९६|| तैसी नित्यनैमित्तिकें| कर्में जियें आवश्यकें| तयांचेविषयीं न शके| बैसला उठूं ||५९७|| येरां काम्याचेनि तरी नांवें| देह सर्वस्व आघवें| वेचितांही न मनवे| बहु ऐसें ||५९८|| अगा देवढी वाढी लाहिजे| तेथ मोल देतां न धाइजे| पेरितां पुरें न म्हणिजे| बीज जेवीं ||५९९|| कां परीसु आलिया हातीं| लोहालागीं सर्वसंपत्ती| वेचितां ये उन्नती| साधकु जैसा ||६००|| तैसीं फळें देखोनि पुढें| काम्यकर्में दुवाडें| करी परी तें थोकडें| केलेंही मानी ||६०१|| तेणें फळकामुकें| यथाविधी नेटकें | काम्य कीजे तितुकें| क्रियाजात ||६०२|| आणि तयाही केलियाचें| तोंडीं लावी दौंडीचें| कर्मी या नांवपाटाचें| वाणें सारी ||६०३|| तैसा भरे कर्माहंकारु| मग पिता अथवा गुरु| ते न मनी काळज्वरु| औषध जैसें ||६०४|| तैसेनि साहंकारें| फळाभिलाषियें नरें| कीजे गा आदरें| जें जें कांहीं ||६०५|| परी तेंही करणें बहुवसा| वळघोनि करी सायासा| जीवनोपावो कां जैसा| कोल्हाटियांचा ||६०६|| एका कणालागींँ उंदिरु| आसका उपसे डोंगरु| कां शेवाळोद्देशें दर्दुरु| समुद्रु डहुळी ||६०७|| पैं भिकेपरतें न लाहे| तऱ्ही गारुडी सापु वाहे| काय कीजे शीणुचि होये| गोडु येकां ||६०८|| हे असो परमाणूचेनि लाभें| पाताळ लंघिती वोळंबे| तैसें स्वर्गसुखलोभें| विचंबणें जें ||६०९|| तें काम्य कर्म सक्लेश| जाणावें येथ राजस| आतां चिन्ह परिस| तामसाचें ||६१०|| अनुबन्धं क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम् | मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ||२५|| तरी तें गा तामस कर्म| जें निंदेचें काळें धाम| निषेधाचें जन्म| सांच जेणें ||६११|| जें निपजविल्यापाठींं| कांहींच न दिसे दिठी| रेघ काढलिया पोटीं| तोयाचे जेवीं ||६१२|| कां कांजी घुसळलिया| कां राखोंडी फुंकलिया| कांहीं न दिसे गाळिलिया| वाळुघाणा ||६१३|| नाना उपणिलिया भूंस| कां विंधिलिया आकाश| नाना मांडिलिया पाश| वारयासी ||६१४|| हें आवघेंचि जैसें| वांझें होऊनि नासे| जें केलिया पाठीं तैसें| वायांचि जाय ||६१५|| येऱ्हवीं नरदेहाही येवढें| धन आटणीये पडे| जें कर्म निफजवितां मोडे| जगाचें सुख ||६१६|| जैसा कमळवनीं फांसु| काढिलिया कांटसु| आपण झिजे नाशु| कमळां करी ||६१७|| कां आपण आंगें जळे| आणि नागवी जगाचे डोळे| पतंगु जैसा सळें| दीपाचेनि ||६१८|| तैसें सर्वस्व वायां जावो| वरी देहाही होय घावो| परी पुढिलां अपावो| निफजविजे जेणें ||६१९|| माशी आपणयातें गिळवी| परी पुढीला वांती शिणवी| तें कश्मळ आठवी| आचरण जें ||६२०|| तेंही करावयो दोषें| मज सामर्थ्य असे कीं नसे | हेंहीं पुढील तैसें| न पाहतां करी ||६२१|| केवढा माझा उपावो| करितां कोण प्रस्तावो| केलियाही आवो| काय येथ ||६२२|| इये जाणिवेची सोये| अविवेकाचेनि पायें| पुसोनियां होये| साटोप कर्मीं ||६२३|| आपला वसौटा जाळुनी| बिसाटे जैसा वन्ही| कां स्वमर्यादा गिळोनि| सिंधु उठी ||६२४|| मग नेणें बहु थोडें| न पाहे मागें पुढें| मार्गामार्ग येकवढें| करीत चाले ||६२५|| तैसें कृत्याकृत्य सरकटित| आपपर नुरवित| कर्म होय तें निश्चित| तामस जाण ||६२६|| ऐसी गुणत्रयभिन्ना| कर्माची गा अर्जुना| हे केली विवंचना| उपपत्तींसीं ||६२७|| आतां ययाचि कर्मा भजतां| कर्माभिमानिया कर्ता| तो जीवुही त्रिविधता| पातला असे ||६२८|| चतुराश्रमवशें| एकु पुरुषु चतुर्धा दिसे| कर्तया त्रैविध्य तैसें| कर्मभेदें ||६२९|| तरी तयां तिहीं आंतु| सात्विक तंव प्रस्तुतु| सांगेन दत्तचित्तु| आकर्णीं तूं ||६३०|| मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः | सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ||२६|| तरी फळोद्देशें सांडिलिया| वाढती जेवीं सरळिया| शाखा कां चंदनाचिया| बावन्नया ||६३१|| कां न फळतांही सार्थका| जैसिया नागलतिका| तैसिया करी नित्यादिकां| क्रिया जो कां ||६३२|| परी फळशून्यता| नाहीं तया विफळता| पैं फळासीचि पंडुसुता| फळें कायिसी ||६३३|| आणि आदरें करी बहुवसें| परी कर्ता मी हें नुमसे| वर्षाकाळींचें जैसें| मेघवृंद ||६३४|| तेवींचि परमात्मलिंगा| समर्पावयाजोगा| कर्मकलापु पैं गा| निपजावया ||६३५|| तया काळातें नुलंघणें| देशशुद्धिही साधणें| कां शास्त्रांच्या वातीं पाहणें| क्रियानिर्णयो ||६३६|| वृत्ति करणें येकवळा| चित्त जावों न देणें फळा| नियमांचिया सांखळा| वाहणें सदा ||६३७|| हा निरोधु साहावयालागीं| धैर्याचिया चांगचांगीं| चिंतवणी जिती आंगीं| वाहे जो कां ||६३८|| आणि आत्मयाचिये आवडी| कर्में करितां वरपडीं| देहसुखाचिये परवडीं| येवों न लाहे ||६३९|| आळसा निद्रा दुऱ्हावे| क्षुधा न बाणवे| सुरवाडु न पावे| आंगाचा ठावो ||६४०|| तंव अधिकाधिक| उत्साहो धरी आगळीक| सोनें जैसें पुटीं तुक| तुटलिया कसीं ||६४१|| जरी आवडी आथी साच| तरी जीवितही सलंच| आगीं घालितां रोमांच| देखिजती सतिये ||६४२|| मा आत्मया येवढीया प्रिया| वालभेला जो धनंजया| देहही सिदतां तया| काय खेदु होईल ? ||६४३|| म्हणौनि विषयसुरवाडु तुटे| जंव जंव देहबुद्धि आटे| तंव तंव आनंदु दुणवटे| कर्मीं जया ||६४४|| ऐसेनि जो कर्म करी| आणि कोणे एके अवसरीं| तें ठाके ऐसी परी| वाहे जरी ||६४५|| तरी कडाडीं लोटला गाडा| तो आपणपें न मनी अवघडा| तैसा ठाकलेनिही थोडा| नोहे जो कां ||६४६|| नातरी आदरिलें| अव्यंग सिद्धी गेलें| तरी तेंही जिंतिलें| मिरवूं नेणें ||६४७|| इया खुणा कर्म करितां| देखिजे जो पंडुसुता| तयातें म्हणिपे तत्त्वतां| सात्विकु कर्ता ||६४८|| आतां राजसा कर्तेया| वोळखणें हें धनंजया| जे अभिलाषा जगाचिया. वसौटा तो ||६४९|| रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः | हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ||२७|| जैसा गावींचिया कश्मळा| उकरडा होय येकवळा| कां स्मशानीं अमंगळा| आघवयांची ||६५०|| तया परी जो अशेषा| विश्वाचिया अभिलाषा| पायपाखाळणिया दोषां| घरटा जाला ||६५१|| म्हणौनि फळाचा लागु| देखे जिये असलगु| तिये कर्मीं चांगु| रोहो मांडी ||६५२|| आणि आपण जालिये जोडी| उपखों नेदी कवडी| क्षणक्षणा कुरोंडी| जीवाची करी ||६५३|| कृपणु चित्तीं ठेवा आपुला| तैसा दक्षु पराविया माला| बकु जैसा खुतला| मासेयासी ||६५४|| आणि गोंवी गेलिया जवळी| झगटलिया अंग फाळी| फळें तरी आंतु पोळी| बोरांटी जैसी ||६५५|| तैसें मनें वाचा कायें| भलतया दुःख देतु जाये| स्वार्थु साधितां न पाहे| पराचें हित ||६५६|| तेवींचि आंगें कर्मीं| आचरणें नोहे क्षमी| न निघे मनोधर्मीं| अरोचकु ||६५७|| कनकाचिया फळा| आंतु माज बाहेरी मौळा| तैसा सबाह्य दुबळा| शुचित्वें जो ||६५८|| आणि कर्मजात केलिया| फळ लाहे जरी धनंजया| तरी हरिखें जगा यया| वांकुलिया वाये ||६५९|| अथवा जें आदरिलें| हीनफळ होय केलें| तरीं शोकें तेणें जिंतिलें| धिक्कारों लागे ||६६०|| कर्मीं राहाटी ऐसी| जयातें होती देखसी| तोचि जाण त्रिशुद्धीसी| राजस कर्ता ||६६१|| आतां यया पाठीं येरु| जो कुकर्माचा आगरु| तोही करूं गोचरु| तामस कर्ता ||६६२|| अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः | विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ||२८|| तरी मियां लागलिया कैसें| पुढील जळत असे | हें नेणिजे हुताशें | जियापरी ||६६३|| पैं शस्त्रें मियां तिखटें | नेणिजे कैसेनि निवटे| कां नेणिजे काळकूटें| आपुलें केलें ||६६४|| तैसा पुढीलया आपुलया| घातु करीत धनंजया| आदरी वोखटिया| क्रिया जो कां ||६६५|| तिया करितांही वेळीं| काय जालें हें न सांभाळी| चळला वायु वाहटुळी| चेष्टे तैसा ||६६६|| पैं करणिया आणि जया| मेळु नाहीं धनंजया| तो पाहुनी पिसेया| कैंचीं त्राय ? ||६६७|| आणि इंद्रियांचें वोगरिलें| चरोनि राखे जो जियालें| बैलातळीं लागलें| गोचिड जैसें ||६६८|| हांसया रुदना वेळु| नेणतां आदरी बाळु| राहाटे उच्छृंखळु| तयापरी ||६६९|| जो प्रकृती आंतलेपणें| कृत्याकृत्यस्वादु नेणे| फुगे केरें धालेपणें| उकरडा जैसा ||६७०|| म्हणौनि मान्याचेनि नांवें| ईश्वराही परी न खालवे| स्तब्धपणें न मनवे| डोंगरासी ||६७१|| आणि मन जयाचें विषकल्लोळीं| राहाटी फुडी चोरिली| दिठी कीर ते वोली| पण्यांगनेची ||६७२|| किंबहुना कपटाचें| देहचि वळिलें तयाचें| तें जिणें कीं जुंवाराचें| टिटेघर ||६७३|| नोहे तयाचा प्रादुर्भावो| तो साभिलाष भिल्लांचा गांवो| म्हणौनि नये येवों जावों| तया वाटा ||६७४|| आणि आणिकांचें निकें केलें| विरु होय जया आलें| जैसें अपेय पया मिनलें| लवण करी ||६७५|| कां हींव ऐसा पदार्थु| घातलिया आगीआंतु| तेचि क्षणीं धडाडितु| अग्नि होय ||६७६|| नाना सुद्रव्यें गोमटीं| जालिया शरीरीं पैठीं| होऊनि ठाती किरीटी| मळुचि जेवीं ||६७७|| तैसें पुढिलाचें बरवें| जयाच्या भीतरीं पावे| आणि विरुद्धचि आघवें| होऊनि निगे ||६७८|| जो गुण घे दे दोख| अमृताचें करी विख| दूध पाजलिया देख| व्याळु जैसा ||६७९|| आणि ऐहिकीं जियावें| जेणें परत्रा साच यावें| तें उचित कृत्य पावे| अवसरीं जिये ||६८०|| तेव्हां जया आपैसी| निद्रा ये ठेविली ऐसी| दुर्व्यवहारीं जैसी| विटाळें लोटे ||६८१|| पैं द्राक्षरसा आम्ररसा| वेळे तोंड सडे वायसा| कां डोळे फुटती दिवसा| डुडुळाचे ||६८२|| तैसा कल्याणकाळु पाहे| तैं तयातें आळसु खाये| ना प्रमादीं तरी होये| तो म्हणे तैसें ||६८३|| जेवींचि सागराच्या पोटीं| जळे अखंड आगिठी | तैसा विषादु वाहे गांठीं| जिवाचिये जो ||६८४|| लेंडोराआगीं धूमावधि| कां अपाना आंगीं दुर्गंधि| तैसा जो जीवितावधि| विषादें केला ||६८५|| आणि कल्पांताचिया पारा| वेगळेंही जो वीरा| सूत्र धरी व्यापारा| साभिलाषा ||६८६|| अगा जगाही परौती| शुचा वाहे पैं चित्तीं| करितां विषीं हातीं| तृणही न लगे ||६८७|| ऐसा जो लोकाआंतु| पापपुंजु मूर्तु| देखसी तो अव्याहतु| तामसु कर्ता ||६८८|| एवं कर्म कर्ता ज्ञान| या तिहींचें त्रिधा चिन्ह| दाविलें तुज सुजन| चक्रवर्ती ||६८९|| बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु | प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञ्जय ||२९|| आतां अविद्येचिया गांवीं| मोहाची वेढूनि मदवी| संदेहाचीं आघवीं| लेऊनि लेणीं ||६९०|| आत्मनिश्चयाची बरव| जया आरिसां पाहे सावयव| तिये बुद्धीचीही धांव| त्रिधा असे ||६९१|| अगा सत्वादि गुणीं इहीं| कायी एक तिहीं ठायीं| न कीजेचि येथ पाहीं| जगामाजीं ||६९२|| आगी न वसतां पोटीं| कवण काष्ठ असे सृष्टीं| तैसें तें कैंचें दृश्यकोटीं| त्रिविध जें नोहे ||६९३|| म्हणौनि तिहीं गुणीं| बुद्धी केली त्रिगुणी| धृतीसिही वांटणी| तैसीचि असे ||६९४|| तेंचि येक वेगळालें| यथा चिन्हीं अळंकारलें| सांगिजैल उपाइलें| भेदलेपणें ||६९५|| परी बुद्धि धृति इयां| दोहीं भागामाजीं धनंंजया| आधीं रूप बुद्धीचिया| भेदासि करूं ||६९६|| तरी उत्तमा मध्यमा निकृष्टा| संसारासि गा सुभटा| प्राणियां येतिया वाटा| तिनी आथी ||६९७|| जे अकरणीय काम्य निषिद्ध| ते हे मार्ग तिन्ही प्रसिद्ध| संसारभयें सबाध| जीवां ययां ||६९८|| प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये | बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ||३०|| म्हणौनि अधिकारें मानिलें| जें विधीचेनि वोघें आलें| तें एकचि येथ भलें| नित्य कर्म ||६९९|| तेंचि आत्मप्राप्ति फळ| दिठी सूनि केवळ| कीजे जैसें कां जळ| सेविजे ताहनें ||७००|| येतुलेनि तें कर्म| सांडी जन्मभय विषम| करूनि दे उगम| मोक्षसिद्धि ||७०१|| ऐसें करी तो भला| संसारभयें सांडिला| करणीयत्वें आला| मुमुक्षुभागा ||७०२|| तेथ जे बुद्धि ऐसा| बळिया बांधे भरंवसा| मोक्षु ठेविला ऐसा| जोडेल येथ ||७०३|| म्हणौनि निवृत्तीची मांडिली| सूनि प्रवृत्तितळीं| इये कर्मीं बुडकुळी| द्यावीं कीं ना ? ||७०४|| तृषार्ता उदकें जिणें| कां पुरीं पडलिया पोहणें| अंधकूपीं गति किरणें| सूर्याचेनि ||७०५|| नाना पथ्येंसीं औषध लाहे| तरी रोगें दाटलाही जिये| का मीना जिव्हाळा होये| जळाचा जरी ||७०६|| तरी तयाच्या जीविता| नाहीं जेवीं अन्यथा| तैसें कर्मीं इये वर्ततां| जोडेचि मोक्षु ||७०७|| हें करणीयाचिया कडे| जें ज्ञान आथी चोखडें| आणि अकरणीय हें फुडें| ऐसें जाण ||७०८|| जीं तिथें काम्यादिकें| संसारभयदायकें| अकृत्यपणाचें आंबुखें| पडिलें जयां ||७०९|| तिये कर्मीं अकार्यीं| जन्ममरणसमयीं| प्रवृत्ति पळवी पायीं| मागिलींचि ||७१०|| पैं आगीमाजीं न रिघवे| अथावीं न घालवे| धगधगीत नागवे| शूळ जेवीं ||७११|| कां काळियानाग धुंधुवातु| देखोनि न घालवे हातु| न वचवे खोपेआंतु| वाघाचिये ||७१२|| तैसें कर्म अकरणीय| देखोनि महाभय| उपजे निःसंदेह| बुद्धी जिये ||७१३|| वाढिलें रांधूनि विखें| तेथें जाणिजे मृत्यु न चुके| तेवीं निषेधीं कां देखे| बंधातें जे ||७१४|| मग बंधभयभरितीं| तियें निषिद्धीं प्राप्ती| विनियोगु जाणे निवृत्ती| कर्माचिये ||७१५|| ऐसेनि कार्याकार्यविवेकी| जे प्रवृत्ति निवृत्ति मापकी| खरा कुडा पारखी| जियापरी ||७१६|| तैसी कृत्याकृत्यशुद्धी| बुझे जे निरवधी| सात्विक म्हणिपे बुद्धी| तेचि तूं जाण ||७१७|| यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च | अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ||३१|| आणि बकाच्या गांवीं| घेपे क्षीरनीर सकलवी| कां अहोरात्रींची गोंवी| आंधळें नेणे ||७१८|| जया फुलाचा मकरंदु फावे| तो काष्ठें कोरूं धांवे| परी भ्रमरपणा नव्हे| अव्हांटा जेवीं ||७१९|| तैसीं इयें कार्याकार्यें| धर्माधर्मरूपें जियें| तियें न चोजवितां जाये| जाणती जे कां ||७२०|| अगा डोळांवीण मोतियें| घेतां पाडु मिळे विपायें| न मिळणें तें आहे| ठेविलें तेथें ||७२१|| तैसें अकरणीय अवचटें| नोडवे तरीच लोटे| येऱ्हवीं जाणें एकवटें| दोन्ही जे कां ||७२२|| ते गा बुद्धि चोखविषीं| जाण येथ राजसी| अक्षत टाकिली जैसी| मांदियेवरी ||७२३|| अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता | सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ||३२|| आणि राजा जिया वाटा जाये| ते चोरांसि आडव होये| कां राक्षसां दिवो पाहे| राती होऊनि ||७२४|| नाना निधानचि निदैवा| होये कोळसयाचा उडवा| पैं असतें आपणपें जीवा| नाहीं जालें ||७२५|| तैसें धर्मजात तितुकें| जिये बुद्धीसी पातकें| साच तें लटिकें| ऐसेंचि बुझे ||७२६|| ते आघवेचि अर्थ| करूनि घाली अनर्थ| गुण ते ते व्यवस्थित| दोषचि मानी ||७२७|| किंबहुना श्रुतिजातें| अधिष्ठूनि केलें सरतें| तेतुलेंही उपरतें| जाणे जे बुद्धी ||७२८|| ते कोणातेंही न पुसतां| तामसी जाणावी पंडुसुता| रात्री काय धर्मार्था| साच करावी ||७२९|| एवं बुद्धीचे भेद| तिन्ही तुज विशद| सांगितले स्वबोध- | कुमुदचंद्रा ||७३०|| आतां ययाचि बुद्धिवृत्ती| निष्टंकिला कर्मजातीं| खांदु मांडिजे धृती| त्रिविधा तया ||७३१|| तिये धृतीचेही विभाग| तिन्ही यथालिंग| सांगिजती चांग| अवधान देईं ||७३२|| धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः | योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ||३३|| तरी उदेलिया दिनकरु| चोरीसिं थोके अंधारु| कां राजाज्ञा अव्यवहारु| कुंठवी जेवीं ||७३३|| नाना पवनाचा साटु| वाजीनलिया नीटु| आंगेंसीं बोभाटु| सांडिती मेघ ||७३४|| कां अगस्तीचेनि दर्शनें| सिंधु घेऊनि ठाती मौनें| चंद्रोदयीं कमळवनें| मिठी देती ||७३५|| हें असो पावो उचलिला| मदमुख न ठेविती खालां| गर्जोनि पुढां जाला| सिंहु जरी ||७३६|| तैसा जो धीरु| उठलिया अंतरु| मनादिकें व्यापारु| सांडिती उभीं ||७३७|| इंद्रियां विषयांचिया गांठी| अपैसया सुटती किरीटी| मन मायेच्या पोटीं| रिगती दाही ||७३८|| अधोर्ध्व गूढें काढी| प्राण नवांची पेंडी| बांधोनि घाली उडी| मध्यमेमाजीं ||७३९|| संकल्पविकल्पांचें लुगडे| सांडूनि मन उघडें| बुद्धि मागिलेकडे| उगीचि बैसे ||७४०|| ऐसी धैर्यराजें जेणें| मन प्राण करणें| स्वचेष्टांचीं संभाषणें| सांडविजती ||७४१|| मग आघवींचि सडीं| ध्यानाच्या आंतुल्या मढीं | कोंडिजती निरवडी| योगाचिये ||७४२|| परी परमात्मया चक्रवर्ती| उगाणिती जंव हातीं| तंव लांचु न घेतां धृती| धरिजती जिया ||७४३|| ते गा धृती येथें| सात्विक हें निरुतें| आईक अर्जुनातें| श्रीकांतु म्हणे ||७४४|| यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन | प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ||३४|| आणि होऊनियां शरीरी| स्वर्गसंसाराच्या दोहीं घरीं| नांदे जो पोटभरी| त्रिवर्गोपायें ||७४५|| तो मनोरथांच्या सागरीं| धर्मार्थकामांच्या तारुवावरी| जेणें धैर्यबळें करी| क्रिया- वणिज ||७४६|| जें कर्म भांडवला सूये| तयाची चौगुणी येती पाहे| येवढें सायास साहे| जया धृती ||७४७|| ते गा धृती राजस| पार्था येथ परीयेस| आतां आइक तामस| तिसरी जे कां ||७४८|| यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च | न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ||३५|| तरी सर्वाधमें गुणें| जयाचें कां रूपा येणें| कोळसा काळेपणें| घडला जैसा ||७४९|| अहो प्राकृत आणि हीनु| तयाही कीं गुणत्वाचा मानु| तरी न म्हणिजे पुण्यजनु| राक्षसु काई ? ||७५०|| पैं ग्रहांमाजीं इंगळु| तयातें म्हणिजे मंगळु| तैसा तमीं धसाळु| गुणशब्दु हा ||७५१|| जे सर्वदोषांचा वसौटा| तमचि कामऊनि सुभटा| उभारिला आंगवठा| जया नराचा ||७५२|| तो आळसु सूनि असे कांखे| म्हणौनि निद्रे कहीं न मुके| पापें पोषितां दुःखें| न सांडिजे जेवीं ||७५३|| आणि देहधनाचिया आवडी| सदा भय तयातें न सांडी| विसंबूं न सके धोंडीं| काठिण्य जैसें ||७५४|| आणि पदार्थजातीं स्नेहो| बांधे म्हणौनि तो शोकें ठावो| केला न शके पाप जावों| कृतघ्नौनि जैसें ||७५५|| आणि असंतोष जीवेंसीं| धरूनि ठेला अहर्निशीं| म्हणौनि मैत्री तेणेंसीं| विषादें केली ||७५६|| लसणातें न सांडी गंधी| कां अपथ्यशीळातें व्याधी| तैसी केली मरणावधी| विषादें तया ||७५७|| आणि वयसा वित्तकामु| ययांचा वाढवी संभ्रमु| म्हणौनि मदें आश्रमु| तोचि केला ||७५८|| आगीतें न सांडी तापु| सळातें जातीचा सापु| कां जगाचा वैरी वासिपु| अखंडु जैसा ||७५९|| नातरी शरीरातें काळु| न विसंबे कवणे वेळु| तैसा आथी अढळु| तामसीं मदु ||७६०|| एवं पांचही हे निद्रादिक| तामसाच्या ठाईं दोख| जिया धृती देख| धरिलें आहाती ||७६१|| तिये गा धृती नांवें| तामसी येथ हें जाणावें| म्हणितलें तेणें देवें| जगाचेनी ||७६२|| एवं त्रिविध जे बुद्धि| कीजे कर्मनिश्चयो आधि| तो धृती या सिद्धि| नेइजो येथ ||७६३|| सूर्यें मार्गु गोचरु होये| आणि तो चालती कीर पाये| परी चालणें तें आहे| धैर्यें जेवीं ||७६४|| तैसी बुद्धि कर्मातें दावी| ते करणसामग्री निफजवी| परी निफजावया होआवी| धीरता जे ||७६५|| ते हे गा तुजप्रती| सांगीतली त्रिविध धृती| यया कर्मत्रया निष्पत्ती| जालिया मग ||७६६|| येथ फळ जें एक निफजे| सुख जयातें म्हणिजे| तेंही त्रिविध जाणिजे| कर्मवशें ||७६७|| तरी फळरूप तें सुख | त्रिगुणीं भेदलें देख| विवंचूं आतां चोख| चोखीं बोलीं ||७६८|| परी चोखी ते कैसी सांगे| पैं घेवों जातां बोलबगें| कानींचियेही लागे| हातींचा मळु ||७६९|| म्हणौनि जयाचेनि अव्हेरें| अवधानही होय बाहिरें| तेणें आइक हो आंतरें| जीवाचेनि जीवें ||७७०|| ऐसें म्हणौनि देवो| त्रिविधा सुखाचा प्रस्तावो| मांडला तो निर्वाहो| निरूपित असें ||७७१|| सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ | अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ||३६|| म्हणे सुखत्रयसंज्ञा| सांगों म्हणौनि प्रतिज्ञा| बोलिलों तें प्राज्ञा| ऐक आतां ||७७२|| तरी सुख तें गा किरीटी| दाविजेल तुज दिठी| जें आत्मयाचिये भेटी| जीवासि होय ||७७३|| परी मात्रेचेनि मापें| दिव्यौषध जैसें घेपें| कां कथिलाचें कीजे रुपें| रसभावनीं ||७७४|| नाना लवणाचें जळु| होआवया दोनि चार वेळु| देऊनि सांडिजती ढाळु| तोयाचें जेवीं ||७७५|| तेवीं जालेनि सुखलेशें| जीवु भाविलिया अभ्यासें| जीवपणाचें नासे| दुःख जेथें ||७७६|| तें येथ आत्मसुख | जालें असे त्रिगुणात्मक| तेंही सांगों एकैक| रूप आतां ||७७७|| यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् | तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ||३७|| आतां चंदनाचें बूड| सर्पी जैसें दुवाड| कां निधानाचें तोंड| विवसिया जेवीं ||७७८|| अगा स्वर्गींचें गोमटें| आडव यागसंकटें| कां बाळपण दासटें| त्रासकाळें ||७७९|| हें असो दीपाचिये सिद्धी| अवघड धू आधीं| नातरी तो औषधीं| जिभेचा ठावो ||७८०|| तयापरी पांडवा| जया सुखाचा रिगावा| विषम तेथ मेळावा| यमदमांचा ||७८१|| देत सर्वस्नेहा मिठी| आगीं ऐसें वैराग्य उठी| स्वर्ग संसारा कांटी| काढितचि ||७८२|| विवेकश्रवणें खरपुसें| जेथ व्रताचरणें कर्कशें| करितां जाती भोकसे| बुद्ध्यादिकांचे ||७८३|| सुषुम्नेचेनि तोंडें| गिळिजे प्राणापानाचे लोंढे| बोहणियेसीचि येवढें| भारी जेथ ||७८४|| जें सारसांही विघडतां| होय वोहाहूनि वस्त काढितां| ना भणंगु दवडितां| भाणयावरुनी ||७८५|| पैं मायेपुढौनि बाळक| काळें नेतां एकुलतें एक| होय कां उदक| तुटतां मीना ||७८६|| तैसें विषयांचें घर| इंद्रियां सांडितां थोर| युगांतु होय तें वीर| विराग साहाती ||७८७|| ऐसा जया सुखाचा आरंभु| दावी काठिण्याचा क्षोभु| मग क्षीराब्धी लाभु| अमृताचा जैसा ||७८८|| पहिलया वैराग्यगरळा| धैर्यशंभु वोडवी गळा| तरी ज्ञानामृतें सोहळा| पाहे जेथें ||७८९|| पैं कोलिताही कोपे ऐसें| द्राक्षांचें हिरवेपण असे | तें परीपाकीं कां जैसें| माधुर्य आते ||७९०|| तें वैराग्यादिक तैसें| पिकलिया आत्मप्रकाशें| मग वैराग्येंसींही नाशे| अविद्याजात ||७९१|| तेव्हां सागरीं गंगा जैसी | आत्मीं मीनल्या बुद्धि तैसी| अद्वयानंदाची आपैसी| खाणी उघडे ||७९२|| ऐसें स्वानुभवविश्रामें| वैराग्यमूळ जें परिणमे| तें सात्विक येणें नामें| बोलिजे सुख ||७९३|| विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् | परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ||३८|| आणि विषयेंद्रियां| मेळु होतां धनंजया| जें सुख जाय थडिया| सांडूनि दोन्ही ||७९४|| अधिकारिया रिगतां गांवो| होय जैसा उत्साहो| कां रिणावरी विवाहो| विस्तारिला ||७९५|| नाना रोगिया जिभेपासीं| केळें गोड साखरेसीं| कां बचनागाची जैसी| मधुरता पहिली ||७९६|| पहिलें संवचोराचें मैत्र| हाटभेटीचें कलत्र| कां लाघवियाचे विचित्र| विनोद ते ||७९७|| तैसें विषयेंद्रियदोखीं| जें सुख जीवातें पोखी| मग उपडिला खडकीं| हंसु जैसा ||७९८|| तैसी जोडी आघवी आटे| जीविताचा ठाय फिटे| सुकृताचियाही सुटे| धनाची गांठी ||७९९|| आणिक भोगिलें जें कांहीं| तें स्वप्न तैसें होय नाहीं| मग हानीच्याचि घाईं| लोळावें उरे ||८००|| ऐसें आपत्ती जें सुख| ऐहिकीं परिणमे देख| परत्रीं कीर विख| होऊनि परते ||८०१|| जे इंद्रियजाता लळा| दिधलिया धर्माचा मळा| जाळूनि भोगिजे सोहळा| विषयांचा जेथ ||८०२|| तेथ पातकें बांधिती थावो| तियें नरकीं देती ठावो| जेणें सुखें हा अपावो| परत्रीं ऐसा ||८०३|| पैं नामें विष महुरें| परी मारूनि अंतीं खरें| तैसें आदि जें गोडिरें| अंतीं कडू ||८०४|| पार्था तें सुख साचें| वळिलें आहे रजाचें| म्हणौनि न शिवें तयाचें| आंग कहीं ||८०५|| यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः | निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ||३९|| आणि अपेयाचेनि पानें| अखाद्याचेनि भोजनें| स्वैरस्त्रीसंनिधानें| होय जें सुख ||८०६|| का पुढिलांचेनि मारें| नातरी परस्वापहारें| जें सुख अवतरे| भाटाच्या बोलीं ||८०७|| जें आलस्यावरी पोखिजे| निद्रेमाजीं जें देखिजे| जयाच्या आद्यंतीं भुलिजे| आपुली वाट ||८०८|| तें गा सुख पार्था| तामस जाण सर्वथा| हें बहु न सांगोंचि जें कथा| असंभाव्य हे ||८०९|| ऐसें कर्मभेदें मुदलें| फळसुखही त्रिधा जालें| तें हें यथागमें केलें| गोचर तुज ||८१०|| ते कर्ता कर्म कर्मफळ| ये त्रिपुटी येकी केवळ| वांचूनि कांहींचि नसे स्थूल| सूक्ष्मीं इये ||८११|| आणि हे तंव त्रिपुटी| तिहीं गुणीं इहीं किरीटी| गुंफिली असे पटीं| तांतुवीं जैसी ||८१२|| न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः | सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ||४०|| म्हणौनि प्रकृतीच्या आवलोकीं| न बंधिजे इहीं सत्वादिकीं| तैसी स्वर्गीं ना मृत्युलोकीं| आथी वस्तु ||८१३|| कैंचा लोंवेवीण कांबळा| मातियेवीण मोदळा| का जळेंवीण कल्लोळा| होणें आहे ? ||८१४|| तैसें न होनि गुणाचें| सृष्टीची रचना रचे| ऐसें नाहींचि गा साचें| प्राणिजात ||८१५|| यालागीं हें सकळ| तिहीं गुणांचेंचि केवळ| घडलें आहे निखिळ| ऐसें जाण ||८१६|| गुणीं देवां त्रयी लाविली| गुणीं लोकीं त्रिपुटी पाडिली| चतुर्वर्णा घातली| सिनानीं उळिगें ||८१७|| ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप | कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ||४१|| तेचि चारी वर्ण| पुससी जरी कोण कोण| तरी जयां मुख्य ब्राह्मण| धुरेचे कां ||८१८|| येर क्षत्रिय वैश्य दोन्ही| तेही ब्राह्मणाच्याचि मानिजे मानी| जे ते वैदिकविधानीं| योग्य म्हणौनि ||८१९|| चौथा शूद्रु जो धनंजया| वेदीं लागु नाहीं तया| तऱ्हीं वृत्ति वर्णत्रया| आधीन तयाची ||८२०|| तिये वृत्तिचिया जवळिका| वर्णा ब्राह्मणादिकां| शूद्रही कीं देखा| चौथा जाला ||८२१|| जैसा फुलाचेनि सांगातें| तांतुं तुरंबिजे श्रीमंतें| तैसें द्विजसंगें शूद्रातें| स्वीकारी श्रुती ||८२२|| ऐसैसी गा पार्था| हे चतुर्वर्णव्यवस्था| करूं आतां कर्मपथा| यांचिया रूपा ||८२३|| जिहीं गुणीं ते वर्ण चारी| जन्ममृत्यूंचिये कातरी| चुकोनियां ईश्वरीं| पैठे होती ||८२४|| जिये आत्मप्रकृतीचे इहीं| गुणीं सत्त्वादिकीं तिहीं| कर्में चौघां चहूं ठाईं| वांटिलीं वर्णा ||८२५|| जैसें बापें जोडिलें लेंका| वांटिलें सूर्यें मार्ग पांथिका| नाना व्यापार सेवकां| स्वामी जैसें ||८२६|| तैसी प्रकृतीच्या गुणीं| जया कर्माची वेल्हावणी| केली आहे वर्णीं| चहूं इहीं ||८२७|| तेथ सत्त्वें आपल्या आंगीं| समीन- निमीन भागीं| दोघे केले नियोगी| ब्राह्मण क्षत्रिय ||८२८|| आणि रज परी सात्त्विक| तेथ ठेविलें वैश्य लोक| रजचि तमभेसक| तेथ शूद्र ते गा ||८२९|| ऐसा येकाचि प्राणिवृंदा| भेदु चतुर्वर्णधा| गुणींचि प्रबुद्धा| केला जाण ||८३०|| मग आपुलें ठेविलें जैसें| आइतेंचि दीपें दिसे| गुणभिन्न कर्म तैसें| शास्त्र दावी ||८३१|| तेंचि आतां कोण कोण| वर्णविहिताचें लक्षण| हें सांगों ऐक श्रवण- | सौभाग्यनिधी ||८३२|| शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च | ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ||४२|| तरी सर्वेंद्रियांचिया वृत्ती| घेऊनि आपुल्या हातीं| बुद्धि आत्मया मिळे येकांतीं| प्रिया जैसी ||८३३|| ऐसा बुद्धीचा उपरमु| तया नाम म्हणिपे शमु| तो गुण गा उपक्रमु| जया कर्माचा ||८३४|| आणि बाह्येंद्रियांचें धेंडें| पिटूनि विधीचेनि दंडें| नेदिजे अधर्माकडे| कहींचि जावों ||८३५|| तो पैं गा शमा विरजा| दमु गुण जेथ दुजा| आणि स्वधर्माचिया वोजा| जिणें जें कां ||८३६|| सटवीचिये रातीं| न विसंबिजे जेवीं वाती| तैसा ईश्वरनिर्णयो चित्तीं| वाहणें सदा ||८३७|| तया नाम तप| ते तिजया गुणाचें रूप| आणि शौचही निष्पाप| द्विविध जेथ ||८३८|| मन भावशुद्धी भरलें| आंग क्रिया अळंकारिलें| ऐसें सबाह्य जियालें| साजिरें जें कां ||८३९|| तया नाम शौच पार्था| तो कर्मीं गुण जये चौथा| आणि पृथ्वीचिया परी सर्वथा| सर्व जें साहाणें ||८४०|| ते गा क्षमा पांडवा| गुण जेथ पांचवा| स्वरांमाजीं सुहावा| पंचमु जैसा ||८४१|| आणि वांकडेनी वोघेंसीं| गंगा वाहे उजूचि जैसी| कां पुटीं वळला ऊसीं| गोडी जैसी ||८४२|| तैसा विषमांही जीवां- | लागीं उजुकारु बरवा| तें आर्जव गा साहावा| जेथींचा गुण ||८४३|| आणि पाणियें प्रयत्नें माळी| अखंड जचे झाडामुळीं| परी तें आघवेंचि फळीं| जाणे जेवीं ||८४४|| तैसें शास्त्राचारें तेणें| ईश्वरुचि येकु पावणें| हें फुडें जें कां जाणणें| तें येथ ज्ञान ||८४५|| तें गा कर्मीं जिये| सातवा गुण होये| आणि विज्ञान हें पाहें| एवंरूप ||८४६|| तरी सत्वशुद्धीचिये वेळे| शास्त्रें कां ध्यानबळें| ईश्वरतत्त्वींचि मिळे| निष्टंकबुद्धी ||८४७|| हें विज्ञान बरवें| गुणरत्न जेथ आठवें| आणि आस्तिक्य जाणावें| नववा गुण ||८४८|| पैं राजमुद्रा आथिलिया| प्रजा भजे भलतया| तेवीं शास्त्रें स्वीकारिलिया| मार्गमात्रातें ||८४९|| आदरें जें कां मानणें| तें आस्तिक्य मी म्हणें| तो नववा गुण जेणें| कर्म तें साच ||८५०|| एवं नवही शमादिक| गुण जेथ निर्दोख| तें कर्म जाण स्वाभाविक| ब्राह्मणाचें ||८५१|| तो नवगुणरत्नाकरु| यया नवरत्नांचा हारु| न फेडीत ले दिनकरु| प्रकाशु जैसा ||८५२|| नाना चांपा चांपौळी पूजिला| चंद्रु चंद्रिका धवळला| कां चंदनु निजें चर्चिला| सौरभ्यें जेवीं ||८५३|| तेवीं नवगुणटिकलग| लेणें ब्राह्मणाचें अव्यंग| कहींचि न संडी आंग| ब्राह्मणाचें ||८५४|| आतां उचित जें क्षत्रिया| तेंहीं कर्म धनंजया| सांगों ऐक प्रज्ञेचिया| भरोवरी ||८५५|| शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् | दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ||४३|| तरी भानु हा तेजें| नापेक्षी जेवीं विरजे| कां सिंहें न पाहिजे| जावळिया ||८५६|| ऐसा स्वयंभ जो जीवें लाठु| सावायेंवीण उद्भटु| ते शौर्य गा जेथ श्रेष्ठु| पहिला गुण ||८५७|| आणि सूर्याचेनि प्रतापें| कोडिही नक्षत्र हारपे| ना तो तरी न लोपे| सचंद्रीं तिहीं ||८५८|| तैसेनि आपुले प्रौढीगुणें| जगा या विस्मयो देणें| आपण तरी न क्षोभणें| कायसेनही ||८५९|| तें प्रागल्भ्यरूप तेजा| जिये कर्मीं गुण दुजा| आणि धीरु तो तिजा| जेथींचा गुण ||८६०|| वरिपडलिया आकाश| बुद्धीचे डोळे मानस| झांकी ना ते परीयेस| धैर्य जेथें ||८६१|| आणि पाणी हो कां भलतेतुकें| परी तें जिणौनि पद्म फांके| कां आकाश उंचिया जिंके| आवडे तयातें ||८६२|| तेवीं विविध अवस्था| पातलिया जिणौनि पार्था| प्रज्ञाफळ तया अर्था| वेझ देणें जें ||८६३|| तें दक्षत्व गा चोख| जेथ चौथा गुण देख| आणि झुंज अलौकिक| तो पांचवा गुण ||८६४|| आदित्याचीं झाडें| सदा सन्मुख सूर्याकडे| तेवीं समोर शत्रूपुढें| होणें जें कां ||८६५|| माहेवणी प्रयत्नेंसी| चुकविजे सेजे जैसी| रिपू पाठी नेदिजे तैसी| समरांगणीं ||८६६|| हा क्षत्रियाचेया आचारीं| पांचवा गुणेंद्रु अवधारीं| चहूं पुरुषार्थां शिरीं| भक्ति जैसी ||८६७|| आणि जालेनि फुलें फळें| शाखिया जैसीं मोकळे| कां उदार परीमळें| पद्माकरु ||८६८|| नाना आवडीचेनि मापें| चांदिणें भलतेणें घेपे| पुढिलांचेनि संकल्पें | तैसें जें देणें ||८६९|| तें उमप गा दान| जेथ सहावें गुणरत्न| आणि आज्ञे एकायतन| होणें जें कां ||८७०|| पोषूनि अवयव आपुले| करविजतीं मानविले| तेवीं पालणें लोभविलें| जग जें भोगणें ||८७१|| तया नाम ईश्वरभावो| जो सर्वसामर्थ्याचा ठावो| तो गुणांमाजीं रावो| सातवा जेथ ||८७२|| ऐसें जें शौर्यादिकीं| इहीं सात गुणविशेखीं| अळंकृत सप्तऋखीं| आकाश जैसें ||८७३|| तैसें सप्तगुणीं विचित्र| कर्म जें जगीं पवित्र| तें सहज जाण क्षात्र| क्षत्रियाचें ||८७४|| नाना क्षत्रिय नव्हे नरु| तो सत्त्वसोनयाचा मेरु| म्हणौनि गुणस्वर्गां आधारु| सातां इयां ||८७५|| नातरी सप्तगुणार्णवीं| परीवारली बरवी| हे क्रिया नव्हे पृथ्वी| भोगीतसे तो ||८७६|| कां गुणांचे सातांही ओघीं| हे क्रिया ते गंगा जगीं| तया महोदधीचिया आंगीं| विलसे जैसी ||८७७|| परी हें बहु असो देख| शौर्यादि गुणात्मक| कर्म गा नैसर्गिक| क्षात्रजातीसी ||८७८|| आतां वैश्याचिये जाती| उचित जे महामती| ते ऐकें गा निरुती| क्रिया सांगों ||८७९|| कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् | परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ||४४|| तरी भूमि बीज नांगरु| यया भांडवलाचा आधारु| घेऊनि लाभु अपारु| मेळवणें जें ||८८०|| किंबहुना कृषी जिणें| गोधनें राखोनि वर्तणें| कां समर्घीची विकणें| महर्घीवस्तु ||८८१|| येतुलाचि पांडवा| वैश्यातें कर्माचा मेळावा| हा वैश्यजातीस्वभावा| आंतुला जाण ||८८२|| आणि वैश्य क्षत्रिय ब्राह्मण| हे द्विजन्में तिन्ही वर्ण| ययांचें जें शुश्रूषण| तें शूद्रकर्म ||८८३|| पैं द्विजसेवेपरौतें| धांवणें नाहीं शूद्रातें| एवं चतुर्वर्णोचितें| दाविलीं कर्में ||८८४|| स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः | स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ||४५|| आतां इयेचि विचक्षणा| वेगळालिया वर्णा| उचित जैसें करणां| शब्दादिक ||८८५|| नातरी जळदच्युता| पाणिया उचित सरिता| सरितेसी पंडुसुता| सिंधु उचितु ||८८६|| तैसें वर्णाश्रमवशें| जें करणीय आलें असे | गोरेया आंगा जैसें| गोरेपण ||८८७|| तया स्वभावविहिता कर्मा| शास्त्राचेनि मुखें वीरोत्तमा| प्रवर्तावयालागीं प्रमा| अढळ कीजे ||८८८|| पैं आपुलेंचि रत्न थितें| घेपे पारखियाचेनि हातें| तैसें स्वकर्म आपैतें| शास्त्रें करावीं ||८८९|| जैसी दिठी असे आपुलिया ठायीं| परी दीपेंवीण भोग नाहीं| मार्गु न लाहतां काई| पाय असतां होय ? ||८९०|| म्हणौनि ज्ञातिवशें साचारु| सहज असे जो अधिकारु| तो आपुलिया शास्त्रें गोचरु| आपण कीजे ||८९१|| मग घरींचाचि ठेवा| जेवीं डोळ्यां दावी दिवा| तरी घेतां काय पांडवा| आडळु असे ? ||८९२|| तैसें स्वभावें भागा आलें| वरी शास्त्रें खरें केलें| तें विहित जो आपुलें| आचरे गा ||८९३|| परी आळसु सांडुनी| फळकाम दवडुनी| आंगें जीवें मांडुनी| तेथेंचि भरु ||८९४|| वोघीं पडिलें पाणी| नेणें आनानी वाहणी| तैसा जाय आचरणीं| व्यवस्थौनी ||८९५|| अर्जुना जो यापरी| तें विहित कर्म स्वयें करी| तो मोक्षाच्या ऐलद्वारीं| पैठा होय ||८९६|| जे अकरणा आणि निषिद्धा| न वचेचि कांहीं संबंधा| म्हणौनि भवा विरुद्धा| मुकला तो ||८९७|| आणि काम्यकर्मांकडे| न परतेचि जेथ कोडें| तेथ चंदनाचेही खोडे| न लेचि तो ||८९८|| येर नित्य कर्म तंव| फळत्यागें वेंचिलें सर्व| म्हणौनि मोक्षाची शींव| ठाकूं लाहे ||८९९|| ऐसेनि शुभाशुभीं संसारीं| सांडिला तो अवधारीं| वौराग्यमोक्षद्वारीं| उभा ठाके ||९००|| जें सकळ भाग्याची सीमा| मोक्षलाभाची जें प्रमा| नाना कर्ममार्गश्रमा| शेवटु जेथ ||९०१|| मोक्षफळें दिधली वोल| जें सुकृततरूचें फूल| तयें वैराग्यीं ठेवी पाऊल| भंवरु जैसा ||९०२|| पाहीं आत्मज्ञानसुदिनाचा| वाधावा सांगतया अरुणाचा| उदयो त्या वैराग्याचा| ठावो पावे ||९०३|| किंबहुना आत्मज्ञान| जेणें हाता ये निधान| तें वैराग्य दिव्यांजन| जीवें ले तो ||९०४|| ऐसी मोक्षाची योग्यता| सिद्धी जाय तया पंडुसुता| अनुसरोनि विहिता| कर्मा यया ||९०५|| हें विहित कर्म पांडवा| आपुला अनन्य वोलावा| आणि हेचि परम सेवा| मज सर्वात्मकाची ||९०६|| पैं आघवाचि भोगेंसीं| पतिव्रता क्रीडे प्रियेंसीं| कीं तयाचीं नामें जैसीं| तपें तियां केलीं ||९०७|| कां बाळका एकी माये| वांचोनि जिणें काय आहे| म्हणौनि सेविजे कीं तो होये| पाटाचा धर्मु ||९०८|| नाना पाणी म्हणौनि मासा| गंगा न सांडितां जैसा| सर्व तीर्थ सहवासा| वरपडा जाला ||९०९|| तैसें आपुलिया विहिता| उपावो असे न विसंबितां| ऐसा कीजे कीं जगन्नाथा| आभारु पडे ||९१०|| अगा जया जें विहित| तें ईश्वराचें मनोगत| म्हणौनि केलिया निभ्रांत| सांपडेचि तो ||९११|| पैं जीवाचे कसीं उतरली| ते दासी कीं गोसावीण जाली| सिसे वेंचि तया मविली| वही जेवीं ||९१२|| तैसें स्वामीचिया मनोभावा| न चुकिजे हेचि परमसेवा| येर तें गा पांडवा| वाणिज्य करणें ||९१३|| यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् | स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ||४६|| म्हणौनि विहित क्रिया केली| नव्हे तयाची खूण पाळिली| जयापसूनि कां आलीं| आकारा भूतें ||९१४|| जो अविद्येचिया चिंधिया| गुंडूनि जीव बाहुलिया| खेळवीतसे तिगुणिया| अहंकाररज्जू ||९१५|| जेणें जग हें समस्त| आंत बाहेरी पूर्ण भरित| जालें आहे दीपजात| तेजें जैसें ||९१६|| तया सर्वात्मका ईश्वरा| स्वकर्मकुसुमांची वीरा| पूजा केली होय अपारा| तोषालागीं ||९१७|| म्हणौनि तिये पूजे| रिझलेनि आत्मराजें| वैराग्यसिद्धि देईजे| पसाय तया ||९१८|| जिये वैराग्यदशें| ईश्वराचेनि वेधवशें| हें सर्वही नावडे जैसें| वांत होय ||९१९|| प्राणनाथाचिया आधी| विरहिणीतें जिणेंही बाधी| तैसें सुखजात त्रिशुद्धी| दुःखचि लागे ||९२०|| सम्यक्ज्ञान नुदैजतां| वेधेंचि तन्मयता| उपजे ऐसी योग्यता| बोधाची लाहे ||९२१|| म्हणौनि मोक्षलाभालागीं| जो व्रतें वाहातसें आंगीं| तेणें स्वधर्मु आस्था चांगी| अनुष्ठावा ||९२२|| श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||४७|| अगा आपुला हा स्वधर्मु| आचरणीं जरी विषमु| तरी पाहावा तो परिणामु| फळेल जेणें ||९२३|| जैं सुखालागीं आपणपयां| निंबचि आथी धनंजया| तैं कडुवटपणा तयाचिया| उबगिजेना ||९२४|| फळणया ऐलीकडे| केळीतें पाहातां आस मोडे| ऐसी त्यजिली तरी जोडे| तैसें कें गोमटें ||९२५|| तेवीं स्वधर्मु सांकडु| देखोनि केला जरी कडु| तरी मोक्षसुरवाडु| अंतरला कीं ||९२६|| आणि आपुली माये| कुब्ज जरी आहे| तरी जीये तें नोहे| स्नेह कुऱ्हें कीं ||९२७|| येरी जिया पराविया| रंभेहुनि बरविया| तिया काय कराविया| बाळकें तेणें ? ||९२८|| अगा पाणियाहूनि बहुवें| तुपीं गुण कीर आहे| परी मीना काय होये| असणें तेथ ||९२९|| पैं आघविया जगा जें विख| तें विख किडियाचें पीयूख| आणि जगा गूळ तें देख| मरण तया ||९३०|| म्हणौनि जे विहित जया जेणें| फिटे संसाराचें धरणें| क्रिया कठोर तऱ्ही तेणें| तेचि करावी ||९३१|| येरा पराचारा बरविया| ऐसें होईल टेंकलया| पायांचें चालणें डोइया| केलें जैसें ||९३२|| यालागीं कर्म आपुले| जें जातिस्वभावें असे आलें| तें करी तेणें जिंतिलें| कर्मबंधातें ||९३३|| आणि स्वधर्मुचि पाळावा| परधर्मु तो गाळावा| हा नेमुही पांडवा| न कीजेचि पै गा ? ||९३४|| तरी आत्मा दृष्ट नोहे| तंव कर्म करणें कां ठाये ? | आणि करणें तेथ आहे| आयासु आधीं ||९३५|| सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् | सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ||४८|| म्हणौनि भलतिये कर्मीं| आयासु जऱ्ही उपक्रमीं| तरी काय स्वधर्मीं| दोषु| सांगें ? ||९३६|| आगा उजू वाटा चालावें| तऱ्ही पायचि शिणवावे| ना आडरानें धांवावें| तऱ्ही तेंचि ||९३७|| पैं शिळा कां सिदोरिया| दाटणें एक धनंजया| परी जें वाहतां विसांवया| मिळिजे तें घेपे ||९३८|| येऱ्हवीं कणा आणि भूसा| कांडितांही सोसु सरिसा| जेंचि रंधन श्वान मांसा| तेंचि हवी ||९३९|| दधी जळाचिया घुसळणा| व्यापार सारिखेचि विचक्षणा| वाळुवे तिळा घाणा| गाळणें एक ||९४०|| पैं नित्य होम देयावया| कां सैरा आगी सुवावया| फुंकितां धू धनंजया| साहणें तेंचि ||९४१|| परी धर्मपत्नी धांगडी| पोसितां जरी एकी वोढी| तरी कां अपरवडी| आणावी आंगा ? ||९४२|| हां गा पाठीं लागला घाई| मरण न चुकेचि पाहीं| तरी समोरला काई| आगळें न कीजे ? ||९४३|| कुलस्त्री दांड्याचे घाये| परघर रिगालीहि जरी साहे| तरी स्वपतीतें वायें| सांडिलें कीं ||९४४|| तैसें आवडतेंही करणें| न निपजे शिणल्याविणें| तरी विहित बा रे कोणें| बोलें भारी ? ||९४५|| वरी थोडेंचि अमृत घेतां| सर्वस्व वेंचो कां पंडुसुता| जेणें जोडे जीविता| अक्षयत्व ||९४६|| येर काह्यां मोलें वेंचूनि| विष पियावे घेऊनि| आत्महत्येसि निमोनि| जाइजे जेणें ||९४७|| तैसें जाचूनियां इंद्रियें| वेंचूनि आयुष्याचेनि दिये| सांचलें पापीं आन आहे| दुःखावाचूनि ? ||९४८|| म्हणौनि करावा स्वधर्मु| जो करितां हिरोनि घे श्रमु| उचित देईल परमु| पुरुषार्थराजु ||९४९|| याकारणें किरीटी| स्वधर्माचिये राहाटी| न विसंबिजे संकटीं| सिद्धमंत्र जैसा ||९५०|| कां नाव जैसी उदधीं| महारोगी दिव्यौषधी| न विसंबिजे तया बुद्धी| स्वकर्म येथ ||९५१|| मग ययाचि गा कपिध्वजा| स्वकर्माचिया महापूजा| तोषला ईशु तमरजा| झाडा करुनी ||९५२|| शुद्धसत्त्वाचिया वाटा| आणी आपुली उत्कंठा| भवस्वर्ग काळकूटा| ऐसें दावी ||९५३|| जियें वैराग्य येणें बोलें| मागां संसिद्धी रूप केलें| किंबहुना तें आपुलें| मेळवी खागें ||९५४|| मग जिंतिलिया हे भोये| पुरुष सर्वत्र जैसा होये| कां जालाही जें लाहे| तें आतां सांगों ||९५५|| असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः | नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ||४९|| तरी देहादिक हें संसारें| सर्वही मांडलेंसे जें गुंफिरें| तेथ नातुडे तो वागुरें| वारा जैसा ||९५६|| पैं परिपाकाचिये वेळे| फळ देठें ना देठु फळें| न धरे तैसें स्नेह खुळें| सर्वत्र होय ||९५७|| पुत्र वित्त कलत्र| हे जालियाही स्वतंत्र| माझें न म्हणे पात्र| विषाचें जैसें ||९५८|| हें असो विषयजाती| बुद्धि पोळली ऐसी माघौती| पाउलें घेऊनि एकांतीं| हृदयाच्या रिगे ||९५९|| ऐसया अंतःकरण| बाह्य येतां तयाची आण| न मोडी समर्था भेण| दासी जैसी ||९६०|| तैसें ऐक्याचिये मुठी| माजिवडें चित्त किरीटी| करूनि वेधी नेहटीं| आत्मयाच्या ||९६१|| तेव्हां दृष्टादृष्ट स्पृहे| निमणें जालेंचि आहे| आगीं दडपलिया धुयें| राहिजे जैसें ||९६२|| म्हणौनि नियमिलिया मानसीं| स्पृहा नासौनि जाय आपैसीं| किंबहुना तो ऐसी| भूमिका पावे ||९६३|| पैं अन्यथा बोधु आघवा| मावळोनि तया पांडवा| बोधमात्रींचि जीवा| ठावो होय ||९६४|| धरवणी वेंचें सरे| तैसें भोगें प्राचीन पुरे| नवें तंव नुपकरे| कांहीचि करूं ||९६५|| ऐसीं कर्में साम्यदशा| होय तेथ वीरेशा| मग श्रीगुरु आपैसा| भेटेचि गा ||९६६|| रात्रीची चौपाहरी| वेंचलिया अवधारीं| डोळ्यां तमारी| मिळे जैसा ||९६७|| का येऊनि फळाचा घडु| पारुषवी केळीची वाढु| श्रीगुरु भेटोनि करी पाडु| बुभुत्सु तैसा ||९६८|| मग आलिंगिला पूर्णिमा| जैसा उणीव सांडी चंद्रमा| तैसें होय वीरोत्तमा| गुरुकृपा तया ||९६९|| तेव्हां अबोधुमात्र असे| तो तंव तया कृपा नासे| तेथ निशीसवें जैसें| आंधारें जाय ||९७०|| तैसी अबोधाचिये कुशी| कर्म कर्ता कार्य ऐशी| त्रिपुटी असे ते जैसी| गाभिणी मारिली ||९७१|| तैसेंचि अबोधनाशासवें| नाशे क्रियाजात आघवें| ऐसा समूळ संभवे| संन्यासु हा ||९७२|| येणें मुळाज्ञानसंन्यासें| दृश्याचा जेथ ठावो पुसे| तेथ बुझावें तें आपैसें| तोचि आहे ||९७३|| चेइलियावरी पाहीं| स्वप्नींचिया तिये डोहीं| आपणयातें काई| काढूं जाइजे ? ||९७४|| तैं मी नेणें आतां जाणेन| हें सरलें तया दुःस्वप्न| जाला ज्ञातृज्ञेयाविहीन| चिदाकाश ||९७५|| मुखाभासेंसी आरिसा| परौता नेलिया वीरेशा| पाहातेपणेंवीण जैसा| पाहाता ठाके ||९७६|| तैसें नेणणें जें गेलें| तेणें जाणणेंही नेलें| मग निष्क्रिय उरलें| चिन्मात्रचि ||९७७|| तेथ स्वभावें धनंजया| नाहीं कोणीचि क्रिया| म्हणौनि प्रवादु तया| नैष्कर्म्यु ऐसा ||९७८|| तें आपुलें आपणपें| असे तेंचि होऊनि हारपे| तरंगु कां वायुलोपें| समुद्रु जैसा ||९७९|| तैसें न होणें निफजे| ते नैष्कर्म्यसिद्धि जाणिजे| सर्वसिद्धींत सहजें| परम हेचि ||९८०|| देउळाचिया कामा कळसु| उपरम गंगेसी सिंधु प्रवेशु| कां सुवर्णशुद्धी कसु| सोळावा जैसा ||९८१|| तैसें आपुलें नेणणें| फेडिजे का जाणणें| तेंहि गिळूनि असणें| ऐसी जे दशा ||९८२|| तियेपरतें कांहीं| निपजणें आन नाहीं| म्हणौनि म्हणिपे पाहीं| परमसिद्धि ते ||९८३|| सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे | समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ||५०|| परी हेचि आत्मसिद्धि| जो कोणी भाग्यनिधि| श्रीगुरुकृपालब्धि- | काळीं पावे ||९८४|| उदयतांचि दिनकरु| प्रकाशुचि आते आंधारु| कां दीपसंगें कापुरु| दीपुचि होय ||९८५|| तया लवणाची कणिका| मिळतखेंवो उदका| उदकचि होऊनि देखा| ठाके जेवीं ||९८६|| कां निद्रितु चेवविलिया| स्वप्नेंसि नीद वायां| जाऊनि आपणपयां| मिळे जैसा ||९८७|| तैसें जया कोण्हासि दैवें| गुरुवाक्यश्रवणाचि सवें| द्वैत गिळोनि विसंवे| आपणया वृत्ती ||९८८|| तयासी मग कर्म करणें| हें बोलिजैलचि कवणें| | आकाशा येणें जाणें| आहे काई ? ||९८९|| म्हणौनि तयासि कांहीं| त्रिशुद्धि करणें नाहीं| परी ऐसें जरी हें कांहीं| नव्हे जया ||९९०|| कानावचनाचिये भेटी- | सरिसाचि पैं किरीटी| वस्तु होऊनि उठी| कवणि एकु जो ||९९१|| येऱ्हवीं स्वकर्माचेनि वन्ही| काम्यनिषिद्धाचिया इंधनीं| रजतमें कीर दोन्ही| जाळिलीं आधीं ||९९२|| पुत्र वित्त परलोकु| यया तिहींचा अभिलाखु| घरीं होय पाइकु| हेंही जालें ||९९३|| इंद्रियें सैरा पदार्थीं| रिगतां विटाळलीं होतीं| तिये प्रत्याहार तीर्थीं| न्हाणिलीं कीर ||९९४|| आणि स्वधर्माचें फळ| ईश्वरीं अर्पूनि सकळ| घेऊनि केलें अढळ| वैराग्यपद ||९९५|| ऐसी आत्मसाक्षात्कारीं| लाभे ज्ञानाची उजरी| ते सामुग्री कीर पुरी| मेळविली ||९९६|| आणि तेचि समयीं| सद्गुरु भेटले पाहीं| तेवींचि तिहीं कांहीं| वंचिजेना ||९९७|| परी वोखद घेतखेंवो| काय लाभे आपला ठावो ? | कां उदयजतांचि दिवो| मध्यान्ह होय ? ||९९८|| सुक्षेत्रीं आणि वोलटें| बीजही पेरिलें गोमटें| तरी आलोट फळ भेटे| परी वेळे कीं गा ||९९९|| जोडला मार्गु प्रांजळु| मिनला सुसंगाचाही मेळु| तरी पाविजे वांचूनि वेळु| लागेचि कीं ||१०००|| तैसा वैराग्यलाभु जाला| वरी सद्गुरुही भेटला| जीवीं अंकुरु फुटला| विवेकाचा ||१००१|| तेणें ब्रह्म एक आथी| येर आघवीचि भ्रांती| हेही कीर प्रतीती| गाढ केली ||१००२|| परी तेंचि जें परब्रह्म| सर्वात्मक सर्वोत्तम| मोक्षाचेंही काम| सरे जेथ ||१००३|| यया तिन्ही अवस्था पोटीं| जिरवी जें गा किरीटी| तया ज्ञानासिही मिठी| दे जे वस्तु ||१००४|| ऐक्याचें एकपण सरे| जेथ आनंदकणुही विरे| कांहींचि नुरोनि उरे| जें कांहीं गा ||१००५|| तियें ब्रह्मीं ऐक्यपणें| ब्रह्मचि होऊनि असणें| तें क्रमेंचि करूनि तेणें| पाविजे पैं ||१००६|| भुकेलियापासीं| वोगरिलें षड्रसीं| तो तृप्ति प्रतिग्रासीं| लाहे जेवीं ||१००७|| तैसा वैराग्याचा वोलावा| विवेकाचा तो दिवा| आंबुथितां आत्मठेवा| काढीचि तो ||१००८|| तरी भोगिजे आत्मऋद्धी| येवढी योग्यतेची सिद्धी| जयाच्या आंगीं निरवधी| लेणें जाली ||१००९|| तो जेणें क्रमें ब्रह्म| होणें करी गा सुगम| तया क्रमाचें आतां वर्म| आईक सांगों ||१०१०|| बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च | शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ||५१|| तरी गुरु दाविलिया वाटा| येऊन विवेकतीर्थतटा| धुऊनियां मळकटा| बुद्धीचा तेणें ||१०११|| मग राहूनें उगळिली| प्रभा चंद्रें आलिंगिली| तैसी शुद्धत्वें जडली| आपणयां बुद्धि ||१०१२|| सांडूनि कुळें दोन्ही| प्रियासी अनुसरे कामिनी| द्वंद्वत्यागें स्वचिंतनीं| पडली तैसी ||१०१३|| आणि ज्ञान ऐसें जिव्हार| नेवों नेवों निरंतर| इंद्रियीं केले थोर| शब्दादिक जे ||१०१४|| ते रश्मिजाळ काढलेया| मृगजळ जाय लया| तैसें वृत्तिरोधें तयां| पांचांही केलें ||१०१५|| नेणतां अधमाचिया अन्ना| खादलिया कीजे वमना| तैसीं वोकविली सवासना| इंद्रियें विषयीं ||१०१६|| मग प्रत्यगावृत्ती चोखटें| लाविलीं गंगेचेनि तटें| ऐसीं प्रायश्चित्तें धुवटें| केलीं येणें ||१०१७|| पाठीं सात्विकें धीरें तेणें| शोधारलीं तियें करणें| मग मनेंसीं योगधारणें| मेळविलीं ||१०१८|| तेवींचि प्राचीनें इष्टानिष्टें| भोगेंसीं येउनी भेटे| तेथ देखिलियाही वोखटें| द्वेषु न करी ||१०१९|| ना गोमटेंचि विपायें| तें आणूनि पुढां सूये| तयालागीं न होये| साभिलाषु ||१०२०|| यापरी इष्टानिष्टींंं| रागद्वेष किरीटी| त्यजूनि गिरिकपाटीं | निकुंजीं वसे ||१०२१|| विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः | ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ||५२|| गजबजा सांडिलिया| वसवी वनस्थळिया| अंगाचियाचि मांदिया| एकलेया ||१०२२|| शमदमादिकीं खेळे| न बोलणेंचि चावळे| गुरुवाक्याचेनि मेळें| नेणे वेळु ||१०२३|| आणि आंगा बळ यावें| नातरी क्षुधा जावें| कां जिभेएचे पुरवावे| मनोरथ ||१०२४|| भोजन करितांविखीं| ययां तिहींतें न लेखी| आहारीं मिती संतोषीं| माप न सूये ||१०२५|| अशनाचेनि पावकें| हारपतां प्राणु पोखे| इतुकियाचि भागु मोटकें| अशन करी ||१०२६|| आणि परपुरुषें कामिली| कुळवधू आंग न घाली| निद्रालस्या न मोकली| आसन तैसें ||१०२७|| दंडवताचेनि प्रसंगें| भुयीं हन अंग लागे| वांचूनि येर नेघे| राभस्य तेथ ||१०२८|| देहनिर्वाहापुरतें| राहाटवी हातांपायांतें| किंबहुना आपैतें| सबाह्य केलें ||१०२९|| आणि मनाचा उंबरा| वृत्तीसी देखों नेदी वीरा| तेथ कें वाग्व्यापारा| अवकाशु असे ? ||१०३०|| ऐसेनि देह वाचा मानस| हें जिणौनि बाह्यप्रदेश| आकळिलें आकाश| ध्यानाचें तेणें ||१०३१|| गुरुवाक्यें उठविला| बोधीं निश्चयो आपुला| न्याहाळीं हातीं घेतला| आरिसा जैसा ||१०३२|| पैं ध्याता आपणचि परी| ध्यानरूप वृत्तिमाझारीं| ध्येयत्वें घे हे अवधारीं| ध्यानरूढी गा ||१०३३|| तेथ ध्येय ध्यान ध्याता| ययां तिहीं एकरूपता| होय तंव पंडुसुता| कीजे तें गा ||१०३४|| म्हणौनि तो मुमुक्षु| आत्मज्ञानीं जाला दक्षु| परी पुढां सूनि पक्षु| योगाभ्यासाचा ||१०३५|| अपानरंध्रद्वया| माझारीं धनंजया| पार्ष्णीं पिडूनियां| कांवरुमूळ ||१०३६|| आकुंचूनि अध| देऊनि तिन्ही बंध| करूनि एकवद| वायुभेदी ||१०३७|| कुंडलिनी जागवूनि| मध्यमा विकाशूनि| आधारादि भेदूनि| आज्ञावरी ||१०३८|| सहस्त्रदळाचा मेघु| पीयुषें वर्षोनि चांगु| तो मूळवरी वोघु| आणूनियां ||१०३९|| नाचतया पुण्यगिरी| चिद्भैरवाच्या खापरीं| मनपवनाची खीच पुरी| वाढूनियां ||१०४०|| जालिया योगाचा गाढा| मेळावा सूनि हा पुढां| ध्यान मागिलीकडां| स्वयंभ केलें ||१०४१|| आणि ध्यान योग दोन्ही| इयें आत्मतत्वज्ञानीं| पैठा होआवया निर्विघ्नीं| आधींचि तेणें ||१०४२|| वीतरागतेसारिखा| जोडूनि ठेविला सखा| तो आघवियाचि भूमिका- | सवें चाले ||१०४३|| पहावें दिसे तंववरी| दिठीतें न संडी दीप जरी| तरी कें आहे अवसरी| देखावया ||१०४४|| तैसें मोक्षीं प्रवर्तलया| वृत्ती ब्रह्मीं जाय लया| तंव वैराग्य आथी तया| भंगु कैचा ||१०४५|| म्हणौनि सवैराग्यु| ज्ञानाभ्यासु तो सभाग्यु| करूनि जाला योग्यु| आत्मलाभा ||१०४६|| ऐसी वैराग्याची आंगीं| बाणूनियां वज्रांगीं| राजयोगतुरंगीं| आरूढला ||१०४७|| वरी आड पडिलें दिठी| सानें थोर निवटी| तें बळीं विवेकमुष्टीं| ध्यानाचें खांडें ||१०४८|| ऐसेनि संसाररणाआंतु |आंधारीं सूर्य तैसा असे जातु | मोक्षविजयश्रीये वरैतु| होआवयालागीं ||१०४९|| अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् | विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ||५३|| तेथ आडवावया आले| दोषवैरी जे धोपटिले| तयांमाजीं पहिलें| देहाहंकारु ||१०५०|| जो न मोकली मारुनी| जीवों नेदी उपजवोनि| विचंबवी खोडां घालुनी| हाडांचिया ||१०५१|| तयाचा देहदुर्ग हा थारा| मोडूनि घेतला तो वीरा| आणि बळ हा दुसरा| मारिला वैरी ||१०५२|| जो विषयाचेनि नांवें| चौगुणेंही वरी थांवे| जेणें मृतावस्था धांवे| सर्वत्र जगा ||१०५३|| तो विषय विषाचा अथावो| आघविया दोषांचा रावो| परी ध्यानखड्गाचा घावो| साहेल कैंचा ? ||१०५४|| आणि प्रिय विषयप्राप्ती| करी जया सुखाची व्यक्ती| तेचि घालूनि बुंथी| आंगीं जो वाजे ||१०५५|| जो सन्मार्गा भुलवी| मग अधर्माच्या आडवीं| सूनि वाघां सांपडवी| नरकादिकां ||१०५६|| तो विश्वासें मारितां रिपु| निवटूनि घातला दर्पु| आणि जयाचा अहा कंपु| तापसांसी ||१०५७|| क्रोधा ऐसा महादोखु| जयाचा देखा परिपाकु| भरिजे तंव अधिकु| रिता होय जो ||१०५८|| तो कामु कोणेच ठायीं| नसे ऐसें केलें पाहीं| कीं तेंचि क्रोधाही| सहजें आलें ||१०५९|| मुळाचें तोडणें जैसें| होय कां शाखोद्देशें| कामु नाशलेनि नाशे| तैसा क्रोधु ||१०६०|| म्हणौनि काम वैरी| जाला जेथ ठाणोरी| तेथ सरली वारी| क्रोधाचीही ||१०६१|| आणि समर्थु आपुला खोडा| शिसें वाहवी जैसा होडा| तैसा भुंजौनि जो गाढा| परीग्रहो ||१०६२|| जो माथांचि पालाणवी| अंगा अवगुण घालवी| जीवें दांडी घेववी| ममत्वाची ||१०६३|| शिष्यशास्त्रादिविलासें| मठादिमुद्रेचेनि मिसें| घातले आहाती फांसे| निःसंगा जेणें ||१०६४|| घरीं कुटुंबपणें सरे| तरी वनीं वन्य होऊनि अवतरे| नागवीयाही शरीरें| लागला आहे ||१०६५|| ऐसा दुर्जयो जो परीग्रहो| तयाचा फेडूनि ठावो| भवविजयाचा उत्साहो| भोगीतसे जो ||१०६६|| तेथ अमानित्वादि आघवे| ज्ञानगुणाचे जे मेळावे| ते कैवल्यदेशींचे आघवे| रावो जैसे आले ||१०६७|| तेव्हां सम्यक्ज्ञानाचिया| राणिवा उगाणूनि तया| परिवारु होऊनियां| राहत आंगें ||१०६८|| प्रवृत्तीचिये राजबिदीं| अवस्थाभेदप्रमदीं| कीजत आहे प्रतिपदीं| सुखाचें लोण ||१०६९|| पुढां बोधाचिये कांबीवरी| विवेकु दृश्याची मांदी सारी| योगभूमिका आरती करी| येती जैसिया ||१०७०|| तेथ ऋद्धिसिद्धींचीं अनेगें| वृंदें मिळती प्रसंगें| तिये पुष्पवर्षीं आंगें| नाहातसे तो ||१०७१|| ऐसेनि ब्रह्मैक्यासारिखें| स्वराज्य येतां जवळिकें| झळंबित आहे हरिखें| तिन्ही लोक ||१०७२|| तेव्हां वैरियां कां मैत्रियां| तयासि माझें म्हणावया| समानता धनंजया| उरेचिही ना ||१०७३|| हें ना भलतेणें व्याजें| तो जयातें म्हणे माझें| तें नोडवेचि कां दुजें| अद्वितीय जाला ||१०७४|| पैं आपुलिया एकी सत्ता| सर्वही कवळूनिया पंडुसुता| कहीं न लगती ममता| धाडिली तेणें ||१०७५|| ऐसा जिंतिलिया रिपुवर्गु| अपमानिलिया हें जगु| अपैसा योगतुरंगु| स्थिर जाला ||१०७६|| वैराग्याचें गाढलें| अंगी त्राण होतें भलें| तेंही नावेक ढिलें| तेव्हां करी ||१०७७|| आणि निवटी ध्यानाचें खांडें| तें दुजें नाहींचि पुढें| म्हणौनि हातु आसुडें| वृत्तीचाही ||१०७८|| जैसें रसौषध खरें| आपुलें काज करोनि पुरें| आपणही नुरे| तैसें होतसे ||१०७९|| देखोनि ठाकिता ठावो| धांवता थिरावे पावो| तैसा ब्रह्मसामीप्यें थावो| अभ्यासु सांडी ||१०८०|| घडतां महोदधीसी| गंगा वेगु सांडी जैसी| कां कामिनी कांतापासीं| स्थिर होय ||१०८१|| नाना फळतिये वेळे| केळीची वाढी मांटुळे| कां गांवापुढें वळे| मार्गु जैसा ||१०८२|| तैसा आत्मसाक्षात्कारु| होईल देखोनि गोचरु| ऐसा साधनहतियेरु| हळुचि ठेवी ||१०८३|| म्हणौनि ब्रह्मेंसी तया| ऐक्याचा समो धनंजया| होतसे तैं उपाया| वोहटु पडे ||१०८४|| मग वैराग्याची गोंधळुक| जे ज्ञानाभ्यासाचें वार्धक्य| योगफळाचाही परिपाक| दशा जे कां ||१०८५|| ते शांति पैं गा सुभगा| संपूर्ण ये तयाचिया आंगा| तैं ब्रह्म होआवया जोगा| होय तो पुरुषु ||१०८६|| पुनवेहुनी चतुर्दशी| जेतुलें उणेपण शशी| कां सोळे पाऊनि जैसी| पंधरावी वानी ||१०८७|| सागरींही पाणी वेगें| संचरे तें रूप गंगे| येर निश्चळ जें उगें| तें समुद्रु जैसा ||१०८८|| ब्रह्मा आणि ब्रह्महोतिये| योग्यते तैसा पाडु आहे| तेंचि शांतीचेनि लवलाहें| होय तो गा ||१०८९|| पैं तेंचि होणेंनवीण| प्रतीती आलें जें ब्रह्मपण| ते ब्रह्म होती जाण| योग्यता येथ ||१०९०|| ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति | समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ||५४|| ते ब्रह्मभावयोग्यता| पुरुषु तो मग पंडुसुता| आत्मबोधप्रसन्नता- | पदीं बैसे ||१०९१|| जेणें निपजे रससोय| तो तापुही जैं जाय| तैं ते कां होय| प्रसन्न जैसी ||१०९२|| नाना भरतिया लगबगा| शरत्काळीं सांडिजे गंगा| कां गीत रहातां उपांगा| वोहटु पडे ||१०९३|| तैसा आत्मबोधीं उद्यमु| करितां होय जो श्रमु| तोही जेथें समु| होऊनि जाय ||१०९४|| आत्मबोधप्रशस्ती| हे तिये दशेची ख्याती| ते भोगितसे महामती| योग्यु तो गा ||१०९५|| तेव्हां आत्मत्वें शोचावें| कांहीं पावावया कामावें| हें सरलें समभावें| भरितें तया ||१०९६|| उदया येतां गभस्ती| नाना नक्षत्रव्यक्ती| हारवीजती दीप्ती| आंगिका जेवीं ||१०९७|| तेवीं उठतिया आत्मप्रथा| हे भूतभेदव्यवस्था| मोडीत मोडीत पार्था| वास पाहे तो ||१०९८|| पाटियेवरील अक्षरें| जैसीं पुसतां येती करें| तैसीं हारपती भेदांतरें| तयाचिये दृष्टी ||१०९९|| तैसेनि अन्यथा ज्ञानें| जियें घेपती जागरस्वप्नें| तियें दोन्ही केलीं लीनें| अव्यक्तामाजीं ||११००|| मग तेंही अव्यक्त| बोध वाढतां झिजत| पुरलां बोधीं समस्त| बुडोनि जाय ||११०१|| जैसी भोजनाच्या व्यापारीं| क्षुधा जिरत जाय अवधारीं| मग तृप्तीच्या अवसरीं| नाहींच होय ||११०२|| नाना चालीचिया वाढी| वाट होत जाय थोडी| मग पातला ठायीं बुडी| देऊनि निमे ||११०३|| कां जागृति जंव जंव उद्दीपे| तंव तंव निद्रा हारपे| मग जागीनलिया स्वरूपें| नाहींच होय ||११०४|| हें ना आपुलें पूर्णत्व भेटें| जेथ चंद्रासीं वाढी खुंटे| तेथ शुक्लपक्षु आटे| निःशेषु जैसा ||११०५|| तैसा बोध्यजात गिळितु| बोधु बोधें ये मज आंतु| मिसळला तेथ साद्यंतु| अबोधु गेला ||११०६|| तेव्हां कल्पांताचिये वेळे| नदी सिंधूचें पेंडवळें| मोडूनि भरलें जळें |आब्रह्म जैसें ||११०७|| नाना गेलिया घट मठ| आकाश ठाके एकवट| कां जळोनि काष्ठें काष्ठ| वन्हीचि होय ||११०८|| नातरी लेणियांचे ठसे| आटोनि गेलिया मुसे| नामरूप भेदें जैसें| सांडिजे सोनें ||११०९|| हेंही असो चेइलया| तें स्वप्न नाहीं जालया| मग आपणचि आपणयां| उरिजे जैसें ||१११०|| तैसी मी एकवांचूनि कांहीं| तया तयाहीसकट नाहीं| हे चौथी भक्ति पाहीं| माझी तो लाहे ||११११|| येर आर्तु जिज्ञासु अर्थार्थी| हे भजती जिये पंथीं| ते तिन्ही पावोनी चौथी| म्हणिपत आहे ||१११२|| येऱ्हवीं तिजी ना चौथी| हे पहिली ना सरती| पैं माझिये सहजस्थिती| भक्ति नाम ||१११३|| जें नेणणें माझें प्रकाशूनि| अन्यथात्वें मातें दाऊनि| सर्वही सर्वीं भजौनि| बुझावीतसे जे ||१११४|| जो जेथ जैसें पाहों बैसे| तया तेथ तैसेंचि असे| हें उजियेडें कां दिसे| अखंडें जेणें ||१११५|| स्वप्नाचें दिसणें न दिसणें| जैसें आपलेनि असलेपणें| विश्वाचें आहे नाहीं जेणें| प्रकाशें तैसें ||१११६|| ऐसा हा सहज माझा| प्रकाशु जो कपिध्वजा| तो भक्ति या वोजा| बोलिजे गा ||१११७|| म्हणौनि आर्ताच्या ठायीं| हे आर्ति होऊनि पाहीं| अपेक्षणीय जें कांहीं | तें मीचि केला ||१११८|| जिज्ञासुपुढां वीरेशा| हेचि होऊनि जिज्ञासा| मी कां जिज्ञास्यु ऐसा| दाखविला ||१११९|| हेंचि होऊनि अर्थना| मीचि माझ्या अर्थीं अर्जुना| करूनि अर्थाभिधाना| आणी मातें ||११२०|| एवं घेऊनि अज्ञानातें| माझी भक्ति जे हे वर्ते| ते दावी मज द्रष्टयातें| दृश्य करूनि ||११२१|| येथें मुखचि दिसे मुखें| या बोला कांहीं न चुके| तरी दुजेपण हें लटिकें| आरिसा करी ||११२२|| दिठी चंद्रचि घे साचें| परी येतुलें हें तिमिराचें| जे एकचि असे तयाचे| दोनी दावी ||११२३|| तैसा सर्वत्र मीचि मियां| घेपतसें भक्ति इया| परी दृश्यत्व हें वायां| अज्ञानवशें ||११२४|| तें अज्ञान आतां फिटलें| माझें दृष्टृत्व मज भेटलें| निजबिंबीं एकवटलें| प्रतिबिंब जैसें ||११२५|| पैं जेव्हांही असे किडाळ| तेव्हांही सोनेंचि अढळ| परी तें कीड गेलिया केवळ| उरे जैसें ||११२६|| हां गा पूर्णिमे आधीं कायी| चंद्रु सावयवु नाहीं ? | परी तिये दिवशीं भेटे पाहीं| पूर्णता तया ||११२७|| तैसा मीचि ज्ञानद्वारें| दिसें परी हस्तांतरें| मग दृष्टृत्व तें सरे| मियांचि मी लाभें ||११२८|| म्हणौनि दृश्यपथा- | अतीतु माझा पार्था| भक्तियोगु चवथा| म्हणितला गा ||११२९|| भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः | ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ||५५||

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